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मैं और मेरे दो दोस्त (सरबजीत)

मैं और मेरे दो दोस्त
(सरबजीत)

मेरे दो दोस्त हैं
एक ख़ुशी और
दूसरा है गम

दोनों से मेरी अक्सर
बातें होती हैं
होती हैं मगर
साथ साथ कभी नहीं
जब एक साथ होता है
न जाने दूसरा
खो जाता है कहीं 

जब होती है ख़ुशी से बात
ऊंचे सुर में होती है वोह
सबको सुनाई देती है
सबको दिखाई भी देती है

गम से अगर बात हो
होती है वोह एकांत में
दो दोस्त मिल बैठते हैं
अलग से
तनहा से
उखड़े उखड़े से
बहुत बार तो
बात होती ही नहीं
बस देखते हैं
एक दूजे को
टिकटिकी लगा के
इतना सन्नाटा
के किसी और को
भनक भी नहीं लगती

लोगों ने मेरे एक ही
दोस्त को देखा है
खिलखिलाने वाले
हँसते, नटखट
मेरे चंचल
दोस्त को.

दूसरे दोस्त को मैंने
खूब छुपा के रख्खा है
वही तो है जिस ने मेरी
तन्हाइयों में साथ दिया है
वोह भी तो अकेला है
भागते हैं उस से सब
कोई नहीं चाहता उस का साथ

जिस गम ने
साथ न छोड़ा मेरा कभी
उस गम को मैंने
संभाला इसी लिए,
सीने से
लगाया इसी लिए.

दो दोस्त हैं मेरे,
हमेशा, ज़िन्दगी भर
साथ देंगे दोनों,
यह वादा है
उनका मुझको.
मेरा भी वादा है उनसे
जब भी आयेंगे
मुझे वो
हस्ता हुआ ही पाएंगे |

सरबजीत

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4 Responses to मैं और मेरे दो दोस्त (सरबजीत)

  1. maninder

    Its too good and so true.when we laugh we laugh together,when we cry we cry alone

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